नित मेरी प्यास बुझाती लबो से पिला मादक हाला रूपसी बाला
मन मस्तिष्क मचलता नित आने को मेरी आधुनिक मधुशाला
कदम खुद बी खुद ठिठकते अंजान डगर राह ढूंढते मेरी मधुशाला
कृतक सदियों से पुजारी दिव्य अनुपम सागरमय अमृतसम हाला
मन मस्तिष्क मचलता नित आने को मेरी आधुनिक मधुशाला
कदम खुद बी खुद ठिठकते अंजान डगर राह ढूंढते मेरी मधुशाला
कृतक सदियों से पुजारी दिव्य अनुपम सागरमय अमृतसम हाला
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