Wednesday, 7 September 2016

मेरे महबूब

पोर पोर खिल उठा
कुमुदनी की मानिंद
पूनम की चाँदनी रात
शबनमी मोतियों ने
जब हुस्ने यार का स्पर्श किया
निखर उठा तन मन
मन उठी कायनात
मेरे यार की
मादक महक से
लम्हा लम्हा महकती फिजा
शबनमी मोतियों की बूँद
हरिक चादर पे हीरे लगे ज्यों
पलकों के आशियाने में
सँवरता हुस्न यार
हा यही प्यार है
बस यही प्यार है
पलकों से डगर बुहारी
दिल का आशियाना
खुबसूरत और लाजवाब
मेरे महबूब मेरे सनम
यही मोहब्बत है

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव