तनहाईयों के
आगोश में
लम्बी घनेरी रातों में
दिल मचलने लगता है
मेरे महबूब
महकती शबनमी फिजाओं में
जब याद तुम्हारी आती है
दिल में कसक सी उठती है
अरमान हवा हो जाते हैं
मेरे अपने थे जो कभी
स्वपन नजर आते हैं
कारे घनियारे
मेघों के आगोष में
दिल मचलने लगता है
महबूब की याद में
आगोश में मुझको लपेटे
तनहाईया साथ निभाती है
पर्त दर पर्त
वक्त खडा बाट जोहता
समय का चक्र नीरंतर
क्या यही प्यार है
हा हा यही.....
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Friday, 9 September 2016
सफर
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खामोशियो की सागिर्दगी
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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