Friday, 9 September 2016

सफर

तनहाईयों के
आगोश में
लम्बी घनेरी रातों में
दिल मचलने लगता है
मेरे महबूब
महकती शबनमी फिजाओं में
जब याद तुम्हारी आती है
दिल में कसक सी उठती है
अरमान हवा हो जाते हैं
मेरे अपने थे जो कभी
स्वपन नजर आते हैं
कारे घनियारे
मेघों के आगोष में
दिल मचलने लगता है
महबूब की याद में
आगोश में मुझको लपेटे
तनहाईया साथ निभाती है
पर्त दर पर्त
वक्त खडा बाट जोहता
समय का चक्र नीरंतर
क्या यही प्यार है
हा हा यही.....

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव