आईना ए दिल में दीदारे यार करते हैं
जिन्दगी से ज्यादा तुमपे एतबार करते हैं
अपने आप की खोज में निकला था मैं
तमाम डगरों के मकडजाल में दिग भृमित हो गया
नजरों से मिली नजरें दिल को एतबार हो गया
पहली मोहब्बत नजर से दिल को उनसे प्यार हो गया
रंग बदलती दुनियाँ में गिरगिट न जाने कहाँ खो गया
आदमियत से तौबा करके आदमी गिरगिट हो गया
तनहाईयों में आईना ए दिल पे एतबार करता हूँ
ए मेरी जाँनशी खुद की जगह तेरा दीदार करता हूँ
दीवानगी के आलम में कृतक अंजान ढह गये
मोहब्बत के मारे डगर तकते ता उमृ तनहा ही रह गये
मनोहर यादव " अमृत सागर "
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