Thursday, 24 November 2016

पतंग

कटी पतंग भी
मुकाम पाती है
जब कुछ वक्त
आजाद फिजाओं मे
उडने के बाद
डोर किसी
मानव द्वारा थाम ली जाती है
पल दो पल
आजाद फिजाओ में
विचरणोपराँत
वह इक बार पुन:
कट जाती
गुम हो जाती है
मिट जाती है
कायनात के उँचे दरख्तों के
हत्थे जब लग जाती है
जिन्दगी का भी
एसा ही कुछ आलम है
कभी कभी एसा लगता है
कटी पतंग और मेरी जिन्दगी में
कोई फर्क नही है
दिल की उमंगे समाप्तपृाय: लगती है
हवाओ के बहने से कोई वास्ता नही
जैसे हवा नही होने पे पतंग
जमीं पे आ जाती है
वैसी ही कुछ मेरी जिन्दगी की कहानी है
वो भी अम्बर से कटके जमीं पे आई
मै भी उसी की मानिंद
दुनियाँ वालों ने लुटने के लिये
चिंदे चिंदे कर दिया
वही सब कुछ जिन्दगी की कहानी है
हकीकत है ये
नही कोई नादानी है
अम्बर की कटी पतंग की
मानिंद मेरी जिन्दगी की कहानी है

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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव