Tuesday, 22 November 2016

पृियतमा रौशनी

पृियतमा रौशनी
तुम्ही से रौशन
ये कायनात सारी है
तुम बिन अँधियारी जिन्दगी
सनम हमारी है
तेरे नूरे रूखसार से रौशन ये
दुनियाँ ये जहाँ है
ये जमीं ये नजारें जमीं आसमाँ है
आलौकिक लगते है
तुम्हीं से तो नजारे
ये चंदा ये सूरज
झिलमिलाते सितारे
तुम मोहब्बत हो
तुम्ही से रौशन जिन्दगी है
रौशनी हमारी
मानव जीवन का असतित्व
तुम्ही से तो है
तुम्ही से है दुनीयादारी
तुम्हारे होने से जिन्दगी का भान है
तुमसे ही साँवरिया की
मनभावन सुरीली तान है
तन मन तुम्ही से रौशन है
तुम्ही से तो रौशन जर्रा जर्रा ए जहाँ है
मुझे इसका भान है
तुम्ही से तो जिन्दगी की शान है
आईना ए दिल में
रोज ही दीदारे यार करता हूँ
रौशनी तुम्ही से तो रौशन है जिन्दगानी
बेपनाह मोहब्बत मेरी सरकार करता हूँ
सारी सरहदों को तोडके
अपना तुम्हें बनाउगाँ
गर तुम न मिली
हरेक हद से मोहब्बत मे गुँजर जाउँगा
जब तुम नहीं होती हो
मन के पास
तनहाईयाँ बहुत सताती है रौशनी
मन के मन्दिर में
तुम्हारी छवि बसी है
तुम्हारा ही दीदार करता हूँ
ए जन्नते हूर
बेपनाह मोहब्बत की दरकार करता हूँ
मन को तिमिर मुक्त करो तुम
मन मंदिर में बस जाओ
हरेक कोशिका रौशन हो जाओ
तन मन शेफाली की महक से महकाओ
बनके चंदा की शबनमी चाँदनी
रौशनी से पोर पोर चमकाओ
महक उठे मन मस्तिष्क
फूँस की बयार बन
तन मन को तुम सहलाओ
हमे आशियाना ए दिल में
बसालों तुम रौशनी
और मोहब्बत बन दिल मे बस जाओ
आओ आ जाओ
रौशनी
नूरे रूखसार से जिन्दगी को चमकाओ

मनोहर यादव " अमृत सागर "

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