Saturday, 19 November 2016

भागीरथी सर्वदा महान

सरस सलिल निर्झर्णी
सरस बहती अविरल
सर्व जनों के पाप हरती
स्वर्ग का मार्ग दिखाती
जिसका जल अमृत तुल्य
बनता कभी संजीवनी
वह कोई आम नदी नही
हिन्दुस्तान की पृाणदायिनी भागीरथी वह
गंगा नाम पावन अति निर्मल
ज्यों मचलती निकसत गोमुख
इलाबाद हो कोलकाता पहुँचती वह जीवन दायिनी सदा
शांत सभ्य सर्वथा भिन्न
सबके पाप कर्मो को समैट
सागर मे होती विलिन
मचलती सागर की धडकन
सागर की मौंजों में समाहित
नही दूर दूर तलक साहिल का ठिकाना
नही कोई कलरव
न पृवाह की कोई फृिक
सागर मे मिल गंगासागर कहलाती
पापियों को पुण्य दिलाती
सारे तीरथ बार बार
गंगासागर एक बार कहलाती
मोक्छ दायिनी पुण्य दायिनी
पाप हरिणी निर्झर्णी
सर्वदा सदा शांत वह रहती
अपने अमृत नीर से बल देती
नही कोई सामान्य नदी
वह भागीरथी सर्वदा महान

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव