सरस सलिल निर्झर्णी
सरस बहती अविरल
सर्व जनों के पाप हरती
स्वर्ग का मार्ग दिखाती
जिसका जल अमृत तुल्य
बनता कभी संजीवनी
वह कोई आम नदी नही
हिन्दुस्तान की पृाणदायिनी भागीरथी वह
गंगा नाम पावन अति निर्मल
ज्यों मचलती निकसत गोमुख
इलाबाद हो कोलकाता पहुँचती वह जीवन दायिनी सदा
शांत सभ्य सर्वथा भिन्न
सबके पाप कर्मो को समैट
सागर मे होती विलिन
मचलती सागर की धडकन
सागर की मौंजों में समाहित
नही दूर दूर तलक साहिल का ठिकाना
नही कोई कलरव
न पृवाह की कोई फृिक
सागर मे मिल गंगासागर कहलाती
पापियों को पुण्य दिलाती
सारे तीरथ बार बार
गंगासागर एक बार कहलाती
मोक्छ दायिनी पुण्य दायिनी
पाप हरिणी निर्झर्णी
सर्वदा सदा शांत वह रहती
अपने अमृत नीर से बल देती
नही कोई सामान्य नदी
वह भागीरथी सर्वदा महान
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Saturday, 19 November 2016
भागीरथी सर्वदा महान
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
खामोशियो की सागिर्दगी
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
-
कच्ची कली कचनार की दिलों को खूब भाती है। इसकी मादक महक आशिको का दिल चुराती है। फिजा को महकाती चार चाँद लगाती है। इसकी मादक महक कामदेव का ...
-
जो दिल के करीब होता है। वो फकत नसीब से होता है। वक्त किसी का अजीज नही है। कर्म से मानव खुशनसीब होता है। कोई हँसता तो कोई रोता ये कर्मो क...
-
रात कविता सपने आई देने लगी मोहब्बत की दोहाई पृियतम तोहे नींद कैसे आई तेरी मोहब्बत ने मेरी निंदिया उडाई
No comments:
Post a Comment