Sunday, 4 December 2016

अंजान डगर

सदियों से
कदम दर कदम
आगे ही आगे
बढता ही जा रहा हूँ मैं
आँधियों और तुफानों से
टकराते हुये निऱबाध गति से
वक्त से कदम मिलाते हुये
बढता ही जा रहा हूँ मैं
बढता ही जा रहा हूँ मैं
नील गगन के तले
महकती फिजाओं में
लरजती कायनात
चहकती हवाओं के साथ
उत्तरोत्तर आगे ही आगे
किसी को परवाह है या नही
बिल्कुल अंजान
मगर नही तनिक हैरान
आगे ही आगे बढता ही जा रहा हूँ मैं
मेरे पथ का कोई अंत
मंजिल का कोई पता नही
जनम से आज तलक
आगे ही आगे बढता ही जा रहा हूँ मैं

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव