कभी सैलाभे अश्क है जिन्दगी
कभी खुशियों का समुन्दर है
जियो हमसफर बनाके साँवरिया को
मेरे यारो जिन्दगी मौजों का मंदिर है
सहराओं के मानिंद गमें जिन्दगी यार होता है
महबूब की मोहब्बत में बासंती फिजाओं सा खुमार होता है
कारवाँओ में गुजर जाती है जिन्दगी यार
मोहब्बत की मादक महक से जिन्दगी मे आता है निखार
इस पिंजर में कैद रूह तुम्हारी ही तो है कन्हाई !
मेरे महबूब काहे तुमने सुध बुध महबूब बिबराई !
मनोहर यादव " अमृत सागर "
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