तुम कभी आइने मे खुद को निहारा न करों
गर वो तुम से मोहब्बत कर बैठा तो मेरा क्या होगा
ये आईना बहुत रंगीन मिजाज यार होता है
बखूबी इस बात से वाकिफ होता है कैसे प्यार होता है
नन्हीं कुमुदनी है तू परदेशी भृमर के गँजन से अंजान है
भृमर कई उपवनों में खेला खाया तू कुमुदनी नादाँ है
बेखबर हो तुम मोहब्बत दर्दे दिल बढाती है
तनहाईयों में यादें के शाये बहुत तडपाते हैं
परदेशी भृमर की रूसवाईयों से अभी अंजान हो तुम
अल्हड , कमसिन , भोली कुमुदनी अभी नादाँ हो तुम
मोहब्बत के परवानों के नसीब में बमुश्किल शुकूँ आता है
जब परदेशी भृमर कुमुदनी की मादक बाहों में रात बिता फुर्र हो जाता है
मनोहर यादव " अमृत सागर "
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