तुम्हारी मोहब्बत में बिताये वो स्वर्णिम पल याद आते हैं
दिल की बेचेनी बढाते हैं तनहाईयों में बहुत सताते हैं
गमें जिन्दगी हुई थी रौशन तुम्हारे नूरे रूखसार
वो मोहब्बत में लबरेज हँसी लम्हें दिल की धडकन बढाते हैं
दरियायें जिस्म की मोहताज मोहब्बत नही होती
आशिकी शक्लों सूरत की मोहताज नहीं होती
आज ख्वाबगाह महक उठी उनकी रूहानी महक से
बयार ओ बासंती महबूब के आने का सबब फकत होती हैं
जहाँ से कूच करने में तनिक भी देरी नही करते दीवाना ए मोहब्बत
उनकी मोहब्बत की महक से महकती है कायनातों फिजा यारों !
मनोहर यादव "अमृत सागर"
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