नव बसंत आगमन महकने लगी कायनातों फिजा
महक लगी कुँज गलियाँ महक उठा वृन्दावन
नित नव कोंपल नित नव कलियाँ नित नव फूल
नव केशर मुस्कान महक उठी वसुन्धरा और धूल
अठखेलियाँ करती सी लगती वसुन्धरा महकती धूल
आमृ मंजरी खिलखिलाके हँस रही कुहूक उठी कोयल
कुमुदनी चहक उठी बासंती बेला बेला में
गुँज उठी कायनातों फिजा उठी भृमर हूक
रितुराज बसंत आगमन भयो री सखी मत अब भूल
मनोहर यादव "अमृत सागर"
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