Thursday, 30 March 2017

आदमी

जमाने की कारगुजारियों में खो जाता है आदमी
अपने अपनों के हाथ का खिलौना बन जाता है आदमी
खामोशी से तनहाईयों में खो जाता है आदमी
जमाने के चलते खुदगर्ज हो जाता है आदमी
माटी का पुतला गर्दिशों के जाता भाव शुन्य हो जाता है आदमी
महबूब की मोहब्बत में जमाने को भुलाता है आदमी
आदमियत की शाख को दाव पे लगाता है आदमी
अहंकार के चलते परवरदिगार को भुलाता है आदमी
खाली हाथ आया था खाली हाथ लौट जाता है आदमी
जमाने की दौलत के जंजाल खुद को भरमाता है आदमी
अपने विवेक से काम लेकर विवेकानंद बन जाता है आदमी
अपनी मर्यादाओं में रहकर मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाता है आदमी
भीष्म पृतिग्या में बंधकर भीष्म पितामाह कहलाता है आदमी !

मनोहर यादव " अमृत सागर "

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव