Wednesday, 5 December 2012

जवाँ महफ़िल में हाला टपकने लगी ! 571-575

571

सांझ ढलने लगी ,रात जगने लगी ,

डगर मधुशाला की उभरने लगी

प्यालों की गूंज उभरने लगी  

जवाँ महफ़िल में हाला टपकने लगी !

572

कमसिन काया मचल रही थी 

संगीत की धुन पर थिरक रही थी 

कर में लिए  सागरमय मनोरम 

स्वागत हेतु मचल रही थी !

573

होटो पर लिए मुस्कान मधुर 

हाथो में छलकते पैमाने 

दिल की अगिनी बढ़ा रही थी

उसकी  कातिल मुस्कान मधुर !

574

मै दिवाना मधुर मधु का 

मधुशाला है ठौर मेरा 

मधु के दिल में रहता मै 

मधु का दिल है आशियाना मीरा मेरा !

575

मधुशाला सदा ही स्वागत करती 

अपने और बगानों का

 दुश्मन को भी दोस्त बनाती ,

प्यार बढ़ाती  मधुशाला !

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव