Wednesday, 2 September 2015

रात अशांत

रात अशांत खामोश
नींद गुमराह मदहोश
आलिशान महलो मे
नामों निशा नही चैनो अमन

दूर बहुत दूर चिरागो का नूर
वादी के मकानों मे जुगनू सी
झिलमिलाती शमाँ
मुस्कराते हुये मेरे महबुब

गगनचुम्भी अटटालिकाये
गुर्जर के मादक तरानो की गूँज
शिलाजीत सी महकती वादिये काश्मीर
जन्नत वसुन्धरा सबब ए जिन्दगी
खामोशी पैर पसारे जैसे कब्रगाह का आलम
जख्मी रूह की कराह बैचेनी का सबब
मेहबुबे मोहब्बत से जुदाई का गम
कैसे भुलाउ शिकारे मे गुजारे जन्नत से पल
बेबसी का आलम हवा भी ठहरी है कही
केसर की महक आरजुये जिन्दगी का सबब
खामोश मदहोश रातों की वीरानगी
डगर खामोश नगर खामोश
मदहोश मोहब्बत दिलो की उमंग
अंजान डगर
महबुबे मोहब्बत सबब ए जिन्दगी
खामोश शहर।

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव