Sunday, 13 December 2015

पुष्प की कुर्बानी अपनी कहानी अपनी जुबानी

महबूब को खुशी देकर यारो मै सदा मुस्कराता हू
मै उपवन का पुष्प शाख से टूटने का  गम भुलाता हू
मानव की जिन्दगी मे हरेक अवसर पे काम आता हँ
देवो के सर पे चढके अपने भाग्य पे इतराता है
जन्नत के मुसाफिरो की अर्थियो की शोभा बढ़ाता है
मानव की करूणाई के वक्त मुस्कराते हुये सहलाता हू
सभी धर्मों के लोगों के काम आता हूँ
अमीर गरीब सभी के द्वारा सराहा जाता हू
मै फूल हू उपवन का सभी के काम आता हू
रति के गुजरे मे सजाकर चार चाँद उसके सौन्दर्य मे लगाता हू
सुहाग की सेज पे सजके दुलारा जाता हू
मूक गवाह कली को फूल बनते देख मुस्कराता हूँ

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव