Tuesday, 15 December 2015

कितनी जल्दी

कितनी जल्दी सुब ढल रही है
कितनी जल्दी शाम हो रही है
देखो जरा गौर से मेरे यारो
जिन्दगी पलक झपकते तमाम हो रही है
हरेक शँय उसकी गुलाम हो रही है
आज सरेआम मोहब्बत निलाम हो रही है
गुर्बत सरेआम कुर्बान हो रही है
हिमानत नदारद सुब शाम हो रही है
आदमियत सरेशाम कत्लेआम हो रही है
जम्हूरियत हुक्मरानो की गुलाम हो रही है
इन्सानियत निलाम हो रही है

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव