Sunday, 8 May 2016

ना बदली ये धरती

ना बदली ये धरती ना ही बदला ये आसमान
पूर्ण: बदल गया धरती का ये इन्सान
सूर्य वहीं है चाँद वहीं है वहीं है अंबर और विधान
कायनात का कारीगर वही है ना बदली कोई खदान
अम्बर के तारे वहीं , वहीं है कुदरती विधान
आखिर क्यों बदल गया इन्सान, क्यों बदल गया इन्सान
हवा हुई विषैली विषैला हो गया रे आसमान
इन्सान अपनी करनी से बदलने लगा कुदरती विधान
अणु परमाणु रसायनिक बम बनाके मृत्युशैया उसने सजाई
परवरदिगार की खिल्ली उडाकर खुद की जय कराई
अहं बृह्मोस्मि के गुरूर डूबकर डगर पतन की बनाई
वाह रे मशीनी इन्सान वाह रे कलयुगी इन्सान

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव