ना बदली ये धरती ना ही बदला ये आसमान
पूर्ण: बदल गया धरती का ये इन्सान
सूर्य वहीं है चाँद वहीं है वहीं है अंबर और विधान
कायनात का कारीगर वही है ना बदली कोई खदान
अम्बर के तारे वहीं , वहीं है कुदरती विधान
आखिर क्यों बदल गया इन्सान, क्यों बदल गया इन्सान
हवा हुई विषैली विषैला हो गया रे आसमान
इन्सान अपनी करनी से बदलने लगा कुदरती विधान
अणु परमाणु रसायनिक बम बनाके मृत्युशैया उसने सजाई
परवरदिगार की खिल्ली उडाकर खुद की जय कराई
अहं बृह्मोस्मि के गुरूर डूबकर डगर पतन की बनाई
वाह रे मशीनी इन्सान वाह रे कलयुगी इन्सान
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Sunday, 8 May 2016
ना बदली ये धरती
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