Sunday, 8 May 2016

जिन्दगी तेरा दीदार कर रहा हूँ मैं

जिन्दगी तेरा दीदार कर रहा हूँ
तुझसे जी भर के प्यार कर रहा हूँ
बहुत ही करीब से जी रहा हूँ
गरल पल पल हरेक पल पी रहा हूँ
मरमर के जी रहा हूँ गरल पी रहा हूँ
हरेक मोड पर दीदार तेरा करता हूँ
तेरे आगोश में मुस्कुराता हूँ सर अपना झुकाता हूँ
जिन्दगी तुझसे बहुत प्यार करता हूँ
हरेक मोड पर हरेक डगर पर दीदार तेरा करता हूँ
कभी बाँहों में भरता हूँ कभी सीने से लगाता हूँ
तेरे दामन में खुद को समेटकर मुस्कुराता हूँ
तुझसे मैं हूँ मुझसे से धरा और आसमाँ नहीं
ये सब सोच सोच कर तनहाइयों के दामन में मुस्कुराता हूँ
बेपनाह मोहब्बत तुझसे करता हूँ
तेरे दीदार को जल बिन मछुरी सा तडपता हूँ
जिन्दगी तेरी हरेक आहट पे कभी मुस्कुराता हूँ
कभी कभी बेशुमार अश्कों से तेरा दामन भिगाता हूँ
माँ की असीम ममता तुझमें पाता हूँ
तेरे चरणों में सर सदा झुकाता हूँ
महबूब की मोहब्बत में इन्दृधनुष के मानिंद मुस्कुराता हूँ
रिश्ते नातो की चकाचौंध में खुद को चौराहें पे खडा पाता हूँ
बेखबर नहीं तुझसे वाकिफ हूँ मैं सब कुछ जानता हूँ
सदियों से तेरी मोहब्बत पहचानता हूँ
तेरी महक से तेरी आहट से अंजान नहीं हूँ
तेरे आगोश में आकर तनिक भी परेशाँ नहीं हूँ
आ जिन्दगी जाने क्यों इन फिजाओ से इन हवाओ से उबने लगा हूँ मैं
जिन्दगी गले लगालें तू अपनी बाहों में भरके खुद में समालें तू
जिन्दगी तुझसे बहुत प्यार करने लगा हूँ
रात दिन तनहाइयों में तेरा इन्तजार करने लगा हूँ मैं

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