Thursday, 16 June 2016

१९६ मेरी आधुनिक मधुशाला

१९६  मेरी आधुनिक मधुशाला

जन्नते हूर रूपसी कमसिन बाला साकी बन आई मेरी मधुशाला
लचीली कमरिया पर सागरमय शोभित कर में अनुपम प्याला
बाला की मादक हाला से कायनात महक रही समां हुआ निराला
कुदरत के खुशाल चितेरे ने मेरी मधुशाला का समां बदल डाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव