Thursday, 16 June 2016

१९५ मेरी आधुनिक मधुशाला

१९५  मेरी आधुनिक मधुशाला


सिंधु और गंगाजल जल सैम शीतल महुये  की मादक हाला
पीके दिलो दिमाग चैन है पाता दिव्य मनोहर अनुपम हाला
सियाचिन के हिमनद सम शीतल सागरमय मादकतम हाला
पीके रूह तक हिल जाती लगता कृतक जन्नत आ पहुँचा निराला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव