Thursday, 16 June 2016

१९३ मेरी आधुनिक मधुशाला

१९३  मेरी आधुनिक मधुशाला

भांति भांति की हालाये  पीकर खुम उठा चंचल मन मतवाला
मानस पटल को भ गई छवि मनोहर मेरी आधुनिक मधुशाला
जैसे अम्बर में उमड़ते घूमते भाँती भांति के मेघ मेरी मधुशाला
कृतक अंजान मन हुआ प्रफुल्लित देख कुदरती रंगों में सजी मधुशाला 

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव