१९३ मेरी आधुनिक मधुशाला
भांति भांति की हालाये पीकर खुम उठा चंचल मन मतवाला
मानस पटल को भ गई छवि मनोहर मेरी आधुनिक मधुशाला
जैसे अम्बर में उमड़ते घूमते भाँती भांति के मेघ मेरी मधुशाला
कृतक अंजान मन हुआ प्रफुल्लित देख कुदरती रंगों में सजी मधुशाला
भांति भांति की हालाये पीकर खुम उठा चंचल मन मतवाला
मानस पटल को भ गई छवि मनोहर मेरी आधुनिक मधुशाला
जैसे अम्बर में उमड़ते घूमते भाँती भांति के मेघ मेरी मधुशाला
कृतक अंजान मन हुआ प्रफुल्लित देख कुदरती रंगों में सजी मधुशाला
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