रूपसी सुरबाला के कर में शोभित दिव्य अनुपम सागरमय हाला
मरमरी बाल के कर से टकराकर अमरतसम हो जाता मादक प्याला
परदेशी पाने को मचलते रूपसी के सागरमय से टपकती हाला
यौवन की प्याली मचलती और झूम उठती मेरी आधुनिक मधुशाला
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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