Wednesday, 15 June 2016

१८९ मेरी आधुनिक मधुशाला

१८९    मेरी आधुनिक मधुशाला

मेरी मोहब्बत अनुपम कृति नित कहती मुझसे ले पीले हाला
अमृतसम सागरमय अनुपम जन्नते हूर रूपसी बाला की हाला
जब जब शब्दों की सुनामी आती कृतक रुख है करता मधुशाला
पाठकों की इबादत हेतु निज गढ़ता अनुपम कृति बैठ मेरी मधुशाला

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव