१७८ मेरी आधुनिक मधुशाला
हे माधवेन्द्र केशवेंद्र तुम एक इशारा बैरन मुरली का कर देना
मैं शक्ति अज़र अमर पचंड सुनामी बनके धरा पे छ जाउंगी
कृतक अंजान की मधुशाला में बनके साकी कोहराम मचउंगी
प्रेम भक्ति की मादक हाला पीकर मुरली अधरों से लगाउंगी
हे माधवेन्द्र केशवेंद्र तुम एक इशारा बैरन मुरली का कर देना
मैं शक्ति अज़र अमर पचंड सुनामी बनके धरा पे छ जाउंगी
कृतक अंजान की मधुशाला में बनके साकी कोहराम मचउंगी
प्रेम भक्ति की मादक हाला पीकर मुरली अधरों से लगाउंगी
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