Monday, 13 June 2016

१७८ मेरी आधुनिक मधुशाला

१७८   मेरी आधुनिक मधुशाला

हे माधवेन्द्र केशवेंद्र तुम एक इशारा बैरन मुरली का कर देना 
मैं शक्ति अज़र अमर पचंड सुनामी बनके धरा पे छ जाउंगी 
कृतक अंजान की मधुशाला में बनके साकी कोहराम मचउंगी 
प्रेम भक्ति की मादक हाला पीकर मुरली अधरों से लगाउंगी 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव