परदेशी जो मधुशाला में आता है सूरते साकी का दीदार कर होश गंवाता है
कमसिन अल्हड जन्नते हूर के दीदार से झूमने लगता है बल खाता है
फिर होश उसे नहीं रहता मधुशाला की महफ़िल में जमाने को भुलाता है
कृतक अंजान मनोहर का शागीर्द बनकर मेरी मधुशाला में धुनि रमाता है
कमसिन अल्हड जन्नते हूर के दीदार से झूमने लगता है बल खाता है
फिर होश उसे नहीं रहता मधुशाला की महफ़िल में जमाने को भुलाता है
कृतक अंजान मनोहर का शागीर्द बनकर मेरी मधुशाला में धुनि रमाता है
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