Wednesday, 6 July 2016

२३१ - मेरी आधुनिक मधुशाला

२३१ - मेरी आधुनिक मधुशाला

मेरी पहली मोहब्बत पावन जैसे मेरी आधुनिक मधुशाला
सागरमय पीके रूह तक मचल जाती पीने को मादक हाला
हाला की मोहब्बत से सदियों तक जुड़ा रहता पीने वाला
जब जी में आता अंजान पथिक चलता पहुंचता मेरी मधुशाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव