Tuesday, 5 July 2016

२२९ - मेरी आधुनिक मधुशाला

२२९ - मेरी आधुनिक मधुशाला

मैं यदुवंशी ग्वाला कभी न चखी मैसे सागरमय अमृत हाला
कभी न डगर ही मैंने देखी जो जाती मेरी आधुनिक मधुशाला
मैं कृतक अंजान डगर मेरे मादक अल्फाज़ो से रची मधुशाला
मेरी मधुशाला से सदियों से कभी न वाकिफ रहा कृतक मतवाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव