२२९ - मेरी आधुनिक मधुशाला
मैं यदुवंशी ग्वाला कभी न चखी मैसे सागरमय अमृत हाला
कभी न डगर ही मैंने देखी जो जाती मेरी आधुनिक मधुशाला
मैं कृतक अंजान डगर मेरे मादक अल्फाज़ो से रची मधुशाला
मेरी मधुशाला से सदियों से कभी न वाकिफ रहा कृतक मतवाला
मैं यदुवंशी ग्वाला कभी न चखी मैसे सागरमय अमृत हाला
कभी न डगर ही मैंने देखी जो जाती मेरी आधुनिक मधुशाला
मैं कृतक अंजान डगर मेरे मादक अल्फाज़ो से रची मधुशाला
मेरी मधुशाला से सदियों से कभी न वाकिफ रहा कृतक मतवाला
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