Wednesday, 20 July 2016

२६७ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ



घनियारी काली घटा के शाये में साकी की हाला अमृतसम लगती है
रब दी सौ अंजली भर पीने के बाद कायनात सतरंगी यार लगाती है
जैसे जैसे सागरमय से ख़ुमारी बढ़ती है सारी दुनियाँ हसीं लगती है
साकी के मादक लबों से टपकती हाला की महकसे कायनात मचलती है



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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव