Thursday, 7 July 2016

२६२ - मेरी आधुनिक मधुशाला

२६२ - मेरी आधुनिक मधुशाला

बाद बड़े अर्से के अवसर आज पाया पियूँगा जी भरके हाला
लबों से अविरल छलकेगी सागरमय आज मेरी मधुशाला
रूपसी सुरबाला मेरी प्रियतमा प्यारी दिल से पिलाती हाला
मधुशाला मुझको जन्नत से प्रिय लगती नहीं कोई टोकने वाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव