Wednesday, 6 July 2016

२४० - मेरी आधुनिक मधुशाला

२४० - मेरी आधुनिक मधुशाला

जब कभी परदेशी गुजरता डगर मेरी आधुनिक मधुशाला
जुबां के तन्तु मचलने लगते चखने को मादकतम हाला
कभी न संयम रखने पाता और पहुंचता मेरी मधुशाला
सुरबाला की मादक हाला पीके सारी थकान भुलाता मतवाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव