Sunday, 10 July 2016

१८४ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

२८ - मेरी आधुनिक मधुशाला

अपने मन्दिर से तन मन को हमनें बना डाला मेरी मधुशाला
बृह्मा सम पावन मस्तिष्क को हमने बना डाला मादक प्याला
सारे जिस्म की नसों अब तो लहू के बनिस्पत दौड़ रही हाला
जिस पावन तन की रुह बृह्मा था अब रूह बन बैठी रूपसी बाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव