२८ - मेरी आधुनिक मधुशाला
अपने मन्दिर से तन मन को हमनें बना डाला मेरी मधुशाला
बृह्मा सम पावन मस्तिष्क को हमने बना डाला मादक प्याला
सारे जिस्म की नसों अब तो लहू के बनिस्पत दौड़ रही हाला
जिस पावन तन की रुह बृह्मा था अब रूह बन बैठी रूपसी बाला
अपने मन्दिर से तन मन को हमनें बना डाला मेरी मधुशाला
बृह्मा सम पावन मस्तिष्क को हमने बना डाला मादक प्याला
सारे जिस्म की नसों अब तो लहू के बनिस्पत दौड़ रही हाला
जिस पावन तन की रुह बृह्मा था अब रूह बन बैठी रूपसी बाला
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