सुरबाला की हाला पीकर शांत न होती अंतर्मन की ज्वाला
कभी न ना ही कहता परदेशी मादक अमृत हाला पीनेवाला
रोज़ सोचता अब ना पियूँगा और न मैं आऊँगा मेरी मधुशाला
लेकिन साँझ ढले नित याद सताती कमसिन बाला की हाला
कभी न ना ही कहता परदेशी मादक अमृत हाला पीनेवाला
रोज़ सोचता अब ना पियूँगा और न मैं आऊँगा मेरी मधुशाला
लेकिन साँझ ढले नित याद सताती कमसिन बाला की हाला
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