आज आतंकवाद की आग में
फृांस जल रहा है
आतंक का दावानल
दिन बा दिन
मानवता उऱ्फ आदमियत
का कत्ल कर रहा है
रो रही है इन्सानियत संगीनों के शाये में
मानव ही मानव का हरेक पल कत्ल कर रहा है
इस दावानल का कोई उपाय नजर नही आता
ए पाक परवरदिगार क्यों नही आदमियत को बचाता
अमृत का मेघ बन मानवता को बचा या रब
सूखे प्यासे जलाशयों को अपनी मोहब्बत से आबाद तू कर
मन की उष्णता तू हर पूनम की शबनमी चाँदनी सा रहम तू कर
तेरी मोहब्बत की प्यासी आज आदमियत है या रब
मेघों से मोहब्बत और प्यार बरसा के धरा को आबाद तू कर
जेठ की गर्मी से जलती धरा पर अपनी मोहब्बत की बरसात तू कर
मोहब्बत की वर्षा तू कर दिमागों को आबाद कर
आतंक और आतंकवाद की फसलों को अपनी उष्णता से बर्बाद तू कर
आदमियत के पौधों की परवरिस तू कर
या रब कत्ल कर आतंकवाद के इस जूनुनी रा वन का
मानव मात्र कोें मोहब्बत की महक से आबाद तू कर
मनोहर यादव "अमृत सागर"
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