तेरी सागरमय हाला पीने को तरसते सुर मुनि तपस्वी और ग्वाला
तेरी सोमरस अमृतसम मुझे भाति कमसिन हसीन रूपसी बाला
तेरे मादक लबों से अमृतसम हाला पीने की चाहत दिल में लिए
सदियों से हरेक हरेक जनम धरा पे आता बनके बनका ग्वाला
आज पियूँगा सागरमय मोहिनी तेरे मादक लबों से गाँव का ग्वाला
No comments:
Post a Comment