२२७ - मेरी आधुनिक मधुशाला
मेरे अलफ़ाज़ मचलते से लगते ज्यों आये पीके मादक हाला
सुनामी बन के फ़िज़ा में छाते चम्पा की महक सम महकते
मेरे अलफ़ाज़ फ़िज़ा में धमा चौकड़ी मचाते सब की जुबां पे आते
मेरी आधुनिक मधुशाला के काव्य पद्य बन सारे जहाँ में छा जाते
मेरे अलफ़ाज़ मचलते से लगते ज्यों आये पीके मादक हाला
सुनामी बन के फ़िज़ा में छाते चम्पा की महक सम महकते
मेरे अलफ़ाज़ फ़िज़ा में धमा चौकड़ी मचाते सब की जुबां पे आते
मेरी आधुनिक मधुशाला के काव्य पद्य बन सारे जहाँ में छा जाते
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