Monday, 4 July 2016

२२५ - मेरी आधुनिक मधुशाला

 २२५  - मेरी आधुनिक मधुशाला  

संगीत की स्वर लहरी पे झूमती रूपसी बाला मधुशाला 
जन्नत का सा समां नित लगता मेरी आधुनिक मधुशाला 
अविरल  सागरमय से बहती दिव्य अनुपम मादक हाला 
मेरी मधुशाला की मादक हाला ने सुरों की भी दीवाना बन डाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव