Wednesday, 13 July 2016

मोहब्बत का उपवन ३

तू समझ
सच्चाई को स्वीकार कर
हकीकत से मुह न मोड
सच्चाई ये है
कि तू डरती है
मोहब्बत करती है
पागलपन की हद तक
बट डर जाती है
समाज से
परिवार से
बेटी से
मोहब्बत सीमाओ मे
अच्छी लगती है मेरे यार
सरहदों मे फलती है मोहब्बत
महकता है प्यार
रब की इबादत
होती है मोहब्बत
रब की इनायत
होता है प्यार
कोशिश कर
सच्चाई से न डर
मेरे यार

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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव