Monday, 25 July 2016

२९५ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

कभी कभी तमाम कोशिशें करने पे भी पैमाना हाथ नहीं आता
रूपसी की मादक नज़रो से परदेशी होशों हवास अपने गंवाता
बाला की अमृत हाला पीने की ललक लेकर परदेशी मधुशाला आता
मेरी मधुशाला की जवां महफ़िल में हुस्न का ज़ाम पीके चकराता 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव