Wednesday, 27 July 2016

३०१ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

 मेरी मधुशाला में महफ़िल नित सजती रोज़ ही पीता हाला
  कंचन सम  अनुपम प्याले में रूपसी देती सागरमय हाला
रोज़ सोचता दिल में अपने अब यह होगा आखिरी प्याला
साँझ ढले नित मुझे पुकारती सी लगती बाला और मधुशाला

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव