पर्त दर पर्त खोलती तेरी सागरमय अमृतसम मादक हाला
जब उदर में जाती अंजलि भर केशरी शबनमी अमृत हाला
अच्छा बुरा कुछ भी ना सोचने देती दिल से जुबा पे लाती हाला
चूहा भी शेर बनके दहाड़ने लगता जब पी लेता रूपसी की हाला
जब उदर में जाती अंजलि भर केशरी शबनमी अमृत हाला
अच्छा बुरा कुछ भी ना सोचने देती दिल से जुबा पे लाती हाला
चूहा भी शेर बनके दहाड़ने लगता जब पी लेता रूपसी की हाला
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