Sunday, 31 July 2016

३१५ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

पर्त  दर पर्त खोलती तेरी सागरमय अमृतसम मादक हाला
जब उदर में जाती अंजलि भर केशरी शबनमी अमृत हाला
अच्छा बुरा कुछ भी ना सोचने देती दिल से जुबा पे लाती हाला
चूहा भी शेर बनके दहाड़ने लगता जब पी लेता रूपसी की हाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव