Thursday, 18 August 2016

राखी : एक अनोखा बन्धन

सावन के सुहाने मौसम में
याद आती हैं साँवन की रिमझिम मादक फुहारें
सावन की फुहारों के बीच झुला झुलती बालिकायें
रक्छा बंधन के आने की खुशियों से दिल का झुमना
बहुत मिठाईयाँ मिलेंगी आज खाने को
खीर पुडियों का मादक महक का पुर्वानुमान

बहन ने सजाई राखी की थाली
मिठाई , कुमकुम , चावल और खुबसूरत रंगी राखियाँ

माथे पे कुमकुम तिलक का लगाना
तिलक में चावल हौले से सजाना
फिर अपने हाथ को आगे बढाना
राखी बँधवाना पैरो को छुना
आशिर्वाद पाकर
मिठाई देख मन ही मन मिठाई का स्वाद महसूस करना
मा से कुछ पैसे लेकर बहन की थाली में रखना
सब कुछ याद आता है
बहन के होते सुनी कलाई
या रब यही है मुकद्दर
यही तेरी खुदाई
बचपन ने कीमत जवानी की चुकाई
राखी आज हो गई पराई
कई वर्षो से सुनी है मेरी कलाई
यही खेल किश्मत का है मेरे भाई
दिन ब दिन दुरिया बढती ही जा रहीं है
मिलन के बीच दुश्वारियों की सुनामी नजर आ रहीं है
दिल में ख्याल नित ही बदल रहे हैं
आशंकाओ के बादल रंगत बदल रहे हैं

अब नहीं रहता कोई इन्तजार तुम्हारी राखी का
तुम्हारी रक्छा का वचन हो गया पुराना
बचपन की यादें न जाने कहाँ खो गई
बडी सी राखियाँ जमाने की गर्त में खो गई
दोस्ती FRIENDS राखियों ने जगह बनाई है
आज बहन की राखी की जगह दोस्ती ने पाई है
राखी का रिश्ता अब लगने लगा है पराया
आज इस कलियुग में बहन ने भाई को दुत्कारा

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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव