Friday, 19 August 2016

३५२ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

जो भी आता है मेरी मधुशाला में पीके हाला  मचल जाता है
सागरमय पीने में बेशुमार मज़ा कृतक परदेशी को आता है
सागरमय की खुमारी में ज़माने के गिले शिकवे भुलाता है
अंजान डगर परदेशी मधुशाला में जन्नत सा शुकुन पाता है 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव