Wednesday, 17 August 2016

३४७ -मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

 पूनम की शबनमी रात में अंजान भ्रमर ने
जवाँ कुमुदनी के लबो से मय पान किया
 सारा ज़माना जाग गया जब कुमुदनी के
नूर से मछली कायनात और जवाँ हुई फ़िज़ा
मनचले परदेशी ने दमकते रुखसार को चूमा
झूम उठा बसंत और बहकाने लगी पुरवैया
कृतक के दिल के तार झनझना उठे यारों
बाहों  में भरके भ्रमर ने कुमुदनी को चूम लिया

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव