कलकल छलछल सागरमय से गिरती पैमानें में मादक हाला
सहराओं में कुमुदनी खिलती मेघों से बरसती सोमरस हाला
परदेशी अनजान डगर चल नित नित आते मेरी मधुशाला
चहलकदमी करते अगणित जन अंजान डगर मेरी मधुशाला
सहराओं में कुमुदनी खिलती मेघों से बरसती सोमरस हाला
परदेशी अनजान डगर चल नित नित आते मेरी मधुशाला
चहलकदमी करते अगणित जन अंजान डगर मेरी मधुशाला
No comments:
Post a Comment