Wednesday, 3 August 2016

३३३ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

रूपसी के गज़रे ने परदेशी जादू कुछ ऐसा आज हमपे डाला
बगैर सागरमय प्याला छुये,कृतक अनजान हुआ मतवाला
रूपसी के गज़रे की मादक महक से फ़िज़ा हुई आज दीवानी
मेरी आधुनिक ई मधुशाला की फ़िज़ा लगती जानी पहिचानी 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव