चार कदम चलता हूँ झूमता मचलता हूँ संभालता और चलता हूँ
अंजान डगर निकालता हूँ मंज़िल आधुनिक मधुशाला पहुँचता हूँ
रूपसी की सागरमय पीके कमल की मानिंद मेरे यारों खिलता हूँ
सुरबाला के नूरे रुखसार का दीवाना मैं परदेशी भौरों सा मचलता हूँ
अंजान डगर निकालता हूँ मंज़िल आधुनिक मधुशाला पहुँचता हूँ
रूपसी की सागरमय पीके कमल की मानिंद मेरे यारों खिलता हूँ
सुरबाला के नूरे रुखसार का दीवाना मैं परदेशी भौरों सा मचलता हूँ
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