सारा ज़माना दुत्कारता मुझको, कहता पियक्कड़ पीनेवाला
सदा हाथ में सागरमय होती राह पकड़ता मेरी अपनी मधुशाला
नहीं कोई ठौर जहां में पाता जो कोई कहलाता पियक्कड़ पीनेवाला
बड़े प्यार से शरणागत बनकर परदेशी को अपना लेती मधुशाला
सदा हाथ में सागरमय होती राह पकड़ता मेरी अपनी मधुशाला
नहीं कोई ठौर जहां में पाता जो कोई कहलाता पियक्कड़ पीनेवाला
बड़े प्यार से शरणागत बनकर परदेशी को अपना लेती मधुशाला
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