तेरी मधुशाला में ज़माने भर का शुकुँ परदेशी यार पाता है
सारे ज़माने के गम भुलाने को परदेशी हाला पीने आता है
कमसिन की सुरमई अँखियों से टपकती हाला पी भुलाता है
अंजान डगर का परदेशी हरेक मोड पे मंजिल अपनी पाता है
सारे ज़माने के गम भुलाने को परदेशी हाला पीने आता है
कमसिन की सुरमई अँखियों से टपकती हाला पी भुलाता है
अंजान डगर का परदेशी हरेक मोड पे मंजिल अपनी पाता है
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