Monday, 8 August 2016

३४३ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

तेरी मधुशाला में ज़माने भर का शुकुँ परदेशी यार पाता है
सारे ज़माने के गम भुलाने को परदेशी  हाला पीने आता है
कमसिन की सुरमई अँखियों से टपकती हाला पी भुलाता है
अंजान डगर का परदेशी हरेक मोड पे मंजिल अपनी पाता है 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव