Saturday, 10 September 2016

शबनमी मोतियों की माला

आहिस्ता आहिस्ता
साँझ ढल रही है
शमाँ जल रही है
निशा मचल रही है
बाहों में समाने के लिये
दिल में उतर जाने के लिये
मोहब्बत के अरमाँ दिल में हजार
मेरे महबूब बस तेरा इन्तजार
जवाँ होती निशा
मचलते अरमाँ दिल में हजार
निशा के सुनहरे सपनों में
दिल में मचलती मोहब्बत की सुनामी अपार
दिन महिने साल गुजरे
बदली रितुयें बेशुमार
बस सदा अक सा मैने पाया
मेरे महबूब तुम्हारी मोहब्बत
बेपनाह प्यार
अँखिंयों में ख्वाब अपार
महबूब की मोहब्बत बेशुमार
तनहाईयों के आलम
अब और होता नही इन्तजार
दिल के उपवन में
महकती निशा
चाँदनी पिरोती शबनमी मोतियों की माला
पलकों के शामियाने में
मोहब्बत की बरसती मादक हाला
मादक लबों का अनुपम प्याला
सप्त सुरों की स्वर लहरी
नित साँझ ढलें गुँजती मेरी मधुशाला
मचलते अरमाँ जवानी के बेशुमार
पायल की खनक छेडती मन के तार
अब और सहा नही जाता होता नही इन्तजार
आजा अब तो मेरे मन के तार
बस तुही मोहब्बत मेरी मेरा प्यार

मनोहर यादव
"अमृत सागर "

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव